हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.
क्या रोज़ी बढ़ाने के लिए कोई विशिष्ट नमाज़ है?
सही सुन्नत में ऐसी कोई विशिष्ट नमाज़ प्रमाणित नहीं है जो केवल रोज़ी बढ़ाने के लिए निर्धारित की गई हो। इसलिए प्रश्न में वर्णित नमाज़ और उससे संबंधित दुआ एक नयी ईजाद की हुई नमाज़ है; यह दीन में ऐसी विधि बनाना है जिसकी अल्लाह ने इजाज़त नहीं दी, यह नव-आविष्कृत बिदअतों में से है जिनसे मनाही की गई है।
हाफ़िज़ इब्न कसीर (रहिमहुल्लाह) कहते हैं :
"अहले-सुन्नत वल-जमाअत का सिद्धांत है कि हर वह कार्य और कथन जो सहाबा से सिद्ध नहीं है, वह बिदअत है। क्योंकि यदि वह अच्छा होता, तो सहाबा हमसे पहले उसे अवश्य करते, क्योंकि उन्होंने भलाई का कोई भी कार्य नहीं छोड़ा, बल्कि हर भलाई की तरफ़ सबसे पहले आगे बढ़े।" (तफ़्सीर इब्न कसीर 7/278-279)
शैख़ सालेह अल-फ़ौज़ान (हफ़िज़हुल्लाह) कहते हैं :
"आज के समय में इबादतों के क्षेत्र में पैदा कर ली गई बिदअतें बहुत अधिक हैं। इबादतों के संबंध में मूल सिद्धांत यह है कि वे तौक़ीफ़ी हैं; इसलिए कोई भी इबादत केवल प्रमाण (दलील) से ही सिद्ध होती है। जिस इबादत पर कोई दलील न हो, वह बिदअत है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने ऐसा काम किया जिस पर हमारा हुक्म नहीं, वह काम अस्वीकार्य (नामंज़ूर) है।” (इसके सहीह होने पर बुखारी व मुस्लिम की सहमति है)। आज जो इबादतें की जा रही हैं और उन पर कोई दलील नहीं, वे बहुत अधिक हैं…” (किताबुत-तौहीद, पृष्ठ 160)
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वसीला पकड़ने का हुक्म
प्रश्न में वर्णित इस मनगढ़त नमाज़ के बाद दुआ करने वाले व्यक्ति का यह कहना : (أتوجه إليك بمحمد نبيك نبي الرحمة صلى الله عليه وآله يا محمد يا رسول الله إني أتوجه بك إلى الله..") "मैं तेरी ओर तेरे नबी, दया के पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के माध्यम से रुख करता हूँ। ऐ मुहम्मद, ऐ अल्लाह के रसूल! मैं आपके माध्यम से अल्लाह की ओर रुख करता हूँ.." ऐसा कहना जायज़ नहीं है; इस प्रकार का तवस्सुल (वसीला पकड़ना) बिदई तवस्सुल के अध्याय से है जो शरीअत में निषिद्ध है।
शरई और बिदई तवस्सुल को समझने के लिए “शरई और बिदई तवस्सुल” नामी शीर्षक वाले प्रश्न का उत्तर देखना चाहिए।
जो कोई भी अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को आपकी मृत्यु के बाद, या किसी अन्य मृत व्यक्ति को, कोई नुक़सान दूर करने या लाभ पुँचाने के लिए पुकारता है, तो वह शिर्क-अकबर (महा पाप) का मुर्तकिब है जो इनसान को मिल्लते‑इस्लाम से बाहर कर देता है। ऐसे व्यक्ति पर ज़रूरी है कि वह अल्लाह तआला से सच्ची तौबा करे।
रोज़ी बढ़ाने के शरई कारण
रोज़ी में बढ़ोतरी के लिए कई शरई कारण हैं, जिनकी तरफ़ इशारा करना और उन पर मुसलमानों का ध्यान दिलाना अच्छा है; ताकि इनसान शरई कारणों को अपनाए और दीन में नयी चीज़ें गढ़ने से बचे। उनमें से कुछ ये हैं :
- इस्तिग़फ़ार (अल्लाह से क्षमा माँगना)
अल्लाह तआला ने फ़रमाया :
فَقُلْتُ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ إِنَّهُ كَانَ غَفَّارًا * يُرْسِلِ السَّمَاءَ عَلَيْكُمْ مِدْرَارًا * وَيُمْدِدْكُمْ بِأَمْوَالٍ وَبَنِينَ وَيَجْعَلْ لَكُمْ جَنَّاتٍ وَيَجْعَلْ لَكُمْ أَنْهَارًا
"मैंने कहा : अपने रब से क्षमा माँगो, निःसंदेह वह अत्यंत क्षमाशील है। वह तुम पर आसमान से भरपूर वर्षा भेजेगा, तुम्हें धन और संतान प्रदान करेगा, तुम्हारे लिए बाग़ लगाएगा और नहरें बहाएगा।" (सूरत नूह : 10-12)
- रिश्तेदारी निभाना (सिला-रहमी)
बुख़ारी (हदीस संख्या : 2067) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2557) ने अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो चाहता है कि उसके रिज़्क़ में विस्तार कर दिया जाए और उसकी उम्र में बरकत हो, उसे चाहिए कि वह अपने रिश्तेदारों से संबंध बनाए रखे।"
इमाम नववी (रहिमहुल्लाह) ने कहा :
"रिज़्क़ में विस्तार का अर्थ है उसका फैलाया जाना और बढ़ाया जाना, और कुछ विद्वानों ने कहा कि इसका अर्थ उसमें बरकत होना है।"
- अधिक सदक़ा देना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ وَمَا أَنْفَقْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
“कह दीजिए : मेरा रब अपने बंदों में से जिस पर चाहे रोज़ी फैलाता है और जिस पर चाहे तंग कर देता है; और जो कुछ तुम खर्च करते हो, वह उसका बदला देता है, और वही सबसे अच्छा रोज़ी देने वाला है।" (सूरत सबा : 39)
मुस्लिम (हदीस संख्या : 2588) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : "सदक़ा देने से माल कम नहीं होता।"
इमाम नववी (रहिमहुल्लाह) ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा : “उलमा ने इसके दो मतलब बताए हैं :
- अल्लाह उस माल में बरकत देता है और उससे नुकसान दूर करता है। तो ज़ाहिरी कमी गुप्त बरकत से पूरी हो जाती है, और यह बात तजुर्बे और आदत से महसूस होती है।
- यदि माल की मात्रा देखने में कम भी हो जाए, तो उस पर मिलने वाला अज्र उसकी कमी की भरपाई करके कई गुना बढ़ा देता है।” उद्धरण समाप्त हुआ।
- अल्लाह का तक़वा अपनाना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया :
وَمَنْ يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًا * وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ
"जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देता है और उसे वहाँ से रोज़ी देता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।" (सूरत अत-तलाक़ : 2-3)
- हज्ज और उमरा बार-बार और लगातार करना।
जैसा कि तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 810) ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “हज्ज और उमरा लगातार करो, क्योंकि वे गरीबी और गुनाहों को वैसे ही दूर करते हैं जैसे धौंकनी (भट्ठी) लोहे, सोने और चाँदी से मैल को दूर कर देती है।” इस हदीस को अलबानी ने सहीह कहा है।
इब्न माजा (हदीस संख्या : 925) ने उम्मे‑सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब फज्र की नमाज़ से फ़ारिग होते और सलाम फेरते, तो यह दुआ पढ़ते :
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا وَرِزْقًا طَيِّبًا وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا
"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभदायक ज्ञान, पाक एवं हलाल रोज़ी और स्वीकार किया हुआ (मक़बूल) अमल माँगता हूँ।" अल्बानी ने इसे सहीह इब्न माजा में सही कहा है।
और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।