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मुझे अपने निजी मामलों में अपने पति के घरवालों के हस्तक्षेप से कैसे निपटना चाहिए? क्या उन्हें जवाब देना बुरा व्यवहार माना जाएगा? क्योंकि वे ऐसे लोगों में से हैं जो चुप रहने पर और ज़्यादा बढ़ जाते हैं। अल्लाह ही जानता है कि मैंने उनके बहुत-से हस्तक्षेपों और उत्तेजक तरीकों को अनदेखा किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें अनदेखा करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उनके सवाल बहुत ज़्यादा हो गए हैं। अल्लाह की क़सम! – शैख - मेरे पति की एक बहन बहुविवाह के बारे में बात कर रही थी, और मेरे पति मेरे बगल में बैठे थे। उसने कहा : "उनके दूसरी शादी करने में क्या बुराई है?" में वहीं बैठी थी, परंतु उसने मेरी भावनाओं की परवाह नहीं की। उस समय, मैं अपनी शादी की शुरुआत में उनसे मिलने गई थी। अल्लाह की क़सम, उन्हें मेरे अच्छे-बुरे का पता नहीं था, फिर भी उन्होंने ऐसी बातें कहीं। जब कभी मेरे पति मेरे किसी काम की तारीफ करते हैं — जो उनके सामने बहुत कम होता है — तो वह कहती हैं : "यह तो उसका कर्तव्य है।" यह सब मेरे सामने होता है, और अल्लाह की कसम, मैंने एक शब्द भी नहीं कहा। क्योंकि मुझे और मेरी बहनों को यह संस्कार दिया गया है कि हम ऐसे लोगों को जवाब न दें, जो हमारे साथ गलत करते हैं। मैं शायद ही कभी शालीनता से जवाब दे पाती हूँ, और तब भी, मुझे आत्मग्लानि होती है। मेरे पति इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि मैंने उनकी उपेक्षा नहीं की है या किसी भी तरह से लापरवाही नहीं बरती है। उनके बच्चे भी वही सवाल पूछते हैं, इतना कि मुझे उनके घर जाने में डर लगता है। जब मैं उनसे मिलने जाती हूँ, तो मैं यह दिखाने की कोशिश नहीं करती कि मैं परेशान हूँ या वे मुझे चोट पहुँचाते हैं या शर्मिंदा करते हैं। मैं सामान्य व्यवहार करती हूँ, लेकिन अंदर ही अंदर उबल रही हूँ। खासकर जब से मेरे पति ने कहा है : "अगर तुम किसी को भी मेरे परिवार के व्यवहार के बारे में बताओगी, तो मैं तुमसे अल्लाह के सामने उनके बारे में सवाल करुँगा।" मेरे सवाल ये हैं : मैंने पहले ही अपनी बहन और अपने भाई की पत्नी को उनके कुछ बर्ताव और मेरे साथ उनके व्यवहार के बारे में बता दिया है। वे — अल्लाह जानता है — समझदार हैं, और वे मुझसे कहती हैं : "जिन चीज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, उनका जवाब शालीनता से दो, और जिन चीज़ों को तुम नज़रअंदाज़ कर सकती हो, उन्हें नज़रअंदाज़ करो।" क्या मैं इसपर गुनाहगार हूँगी? क्या मेरे पति को यह हक़ है कि वे मुझे किसी से भी अपने व्यवहार के बारे में बात न करने की चेतावनी दें, जबकि हर किसी को अपनी समस्याओं और चिंताओं के बारे में किसी न किसी से खुलकर बात करनी ही पड़ती है? मैं इतनी दबी हुई महसूस करती हूँ कि अब मैं उनसे मिलना या उनकी आवाज़ सुनना नहीं चाहती। मैं बहुत ज़्यादा परेशान हूँ, यहाँ तक कि अपने पति के साथ भी, और मैं चिड़चिड़ी हो गई हूँ। मुझे उनके साथ रूखा व्यवहार करना पसंद नहीं है, और मैं समझती हूँ कि वे नहीं चाहते कि उनके परिवार की छवि किसी के सामने धूमिल हो। लेकिन मुझे उन लोगों से सलाह लेने का अधिकार है जो मुझसे उम्र में बड़े और ज़्यादा अनुभवी हैं। क्या मुझे किसी ऐसे व्यक्ति से सलाह लेने और अपनी चिंताएं बताने की इजाज़त है जिस पर मैं भरोसा करती हूँ, या मुझे इस दमन और भावनात्मक तनाव के चक्र में फँसा रहना चाहिए? मैं अपने पति और उनके परिवार के साथ इस तरह कैसे पेश आ सकती हूँ जिससे अल्लाह प्रसन्न हो, बिना अपने अधिकारों का हनन किए या हमारे रिश्ते की सीमाओं को लांघे?
क्योंकि बहुत-से घर तबाह हो जाते हैं जब एक साथी दूसरे के साथ अपने संबंधों में सीमाएँ लांघ जाता है और कोई सीमाएँ तय नहीं होतीं। क्या समस्याओं से बचने के लिए उनके घरवालों के पास रहने से इनकार करना मेरे लिए जायज़ है? अल्लाह आपको जन्नत प्रदान करे।
हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.
सबसे पहले :
एक पत्नी और उसके पति के परिवार के बीच उत्पन्न होने वाली समस्याएँ बहुत हैं। लेकिन किसी भी समस्या को हल करने के लिए, सबसे पहले उसके कारणों की जाँच करनी चाहिए :
दूसरा :
हमारा मानना है कि अगर पति उसे निर्देश देता है कि वह उसके और उसके घरवालों के बीच जो कुछ भी होता है, उसके बारे में किसी को न बताए, तो पत्नी को उसकी बात माननी चाहिए। पति का यह निर्णय पत्नी की अपनी भड़ास निकालने की इच्छा से कहीं ज़्यादा हितकारी है। क्योंकि अगर ऐसे मामले सार्वजनिक हो जाएँ और फैल जाएँ, तो हर कोई अपनी राय देगा, योजनाएँ बनाएगा, या गलत समाधान सुझाएगा। इससे स्थिति और बिगड़ेगी, समस्याएँ और उनके कारण बढ़ेंगे, और उनका समाधान कष्टपूर्ण या बहुत कठिन हो जाएगा।
पत्नी का किसी समझदार व्यक्ति से शिकायत करना जायज़ है और यह निषिद्ध गीबत (पीठ पीछे बुराई करने) के अंतर्गत नहीं आता है – तथा प्रश्न संख्या (7660) का उत्तर देखें। साथ ही, पति को यह अधिकार है कि अगर उसे ऐसा करने का कोई जायज़ धार्मिक कारण नज़र आए, तो वह पत्नी को इस जायज़ कार्य से रोक सकता है।
हम समझते हैं कि आपने अपने पति की बात न मानकर और अपनी बहन और अपने भाई की पत्नी को अपने और अपने पति के घरवालों के बीच हुई बातचीत के बारे में बताकर गलती की है। इसे सुधारने के लिए, आपको तौबा करनी चाहिए और अल्लाह से क्षमा माँगनी चाहिए, उनसे इस बारे में बात करने से बचना चाहिए, और उन्हें सलाह देनी चाहिए कि वे आपके द्वारा कही गई किसी भी बात का ज़िक्र किसी और से न करें। आपने जो किया है, उसे अपने पति के सामने स्वीकारने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा; बल्कि, इसके नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं, जैसे कि वह आपसे और आपके कार्यों से नफ़रत करने लगे, और आपको अपनी बहन और भाई की पत्नी से बात करने से पूरी तरह मना कर दे। यह सब होना स्वाभाविक है, क्योंकि ऐसे समय में शैतान की उपस्थिति प्रबल होती है, जो मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और इसके कारण दुश्मनी और नफ़रत फैलाता है।
तीसरा :
अपने पति और उनके घरवालों के साथ व्यवहार करने के लिए आपको बहुत समझदारी की ज़रूरत है, और आप — अल्लाह की इच्छा से — इसे संभालने में सक्षम हैं। यह बात हमें आपके इस कथन से स्पष्ट हो गई : "क्योंकि मुझे और मेरी बहनों को यह संस्कार दिया गया है कि हम ऐसे लोगों को जवाब न दें, जो हमारे साथ गलत करते हैं। मैं शायद ही कभी शालीनता से जवाब दे पाती हूँ, और तब भी, मुझे आत्मग्लानि होती है।" तथा यह बात आपके दूसरे कथन से भी स्पष्ट है : "जब मैं उनके घर जाती हूँ, तो मैं यह नहीं दिखाती कि मैं परेशान, आहत या शर्मिंदा हूँ। मैं सामान्य व्यवहार करती हूँ, लेकिन अंदर ही अंदर उबल रही होती हूँ।" यह ऐसा काम है जो केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसके पास आत्म-संयम (सेल्फ़-कंट्रोल) हो, तथा केवल बुद्धिमान लोग ही ऐसा कर सकते हैं।
आपसे जो अपेक्षित है वह निम्नलिखित है :
आप अपने रब, अल्लाह से दुआ के माध्यम से मदद माँगें, साथ ही अपनी अनिवार्य इबादत भी पूरी करें। हम सर्वशक्तिमान अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह आपको उस चीज़ का सामर्थ्य प्रदान करे जो उसे पसंद हो और आप सभी को भलाई में एकजुट करे।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।